गोंदिया: ₹14 करोड़ की पैतृक संपत्ति विवाद में बड़ा झटका: मुकेश कारडा की अग्रिम जमानत खारिज

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गोंदिया | 02 जुलाई

करीब ₹14 करोड़ से अधिक मूल्य की पैतृक संपत्ति, राइस मिल, धर्मकांटा, गोदाम और साझेदारी फर्मों से जुड़े बहुचर्चित कथित जालसाजी, प्रतिरूपण (इम्पर्सनेशन) और फर्जी दस्तावेज तैयार करने के मामले में गोंदिया के अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने आरोपी मुकेशकुमार तन्नूमल कारडा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। हालांकि, न्यायालय ने पहले से प्रभावी अंतरिम संरक्षण को सात दिनों तक जारी रखते हुए आरोपी को उच्च न्यायालय में अपील करने का अवसर प्रदान किया है।

यह मामला गोरेगांव पुलिस थाना में दर्ज अपराध क्रमांक 686/2025 से जुड़ा है। एफआईआर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), न्यायालय क्रमांक-2, गोंदिया के आदेश के बाद दर्ज की गई थी, जिसमें प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध पाए जाने पर पुलिस को मामला दर्ज कर जांच के निर्देश दिए गए थे।

फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी से संपत्ति हड़पने का आरोप

एफआईआर और पुलिस जांच के अनुसार आरोप है कि मुकेशकुमार तन्नूमल कारडा ने अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर कथित रूप से श्री तन्नूमल अरतमल कारडा के स्थान पर एक अन्य व्यक्ति को रायपुर स्थित उप-पंजीयक कार्यालय में प्रस्तुत कराया और उसके माध्यम से फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी तैयार कराई। आरोप है कि इसी कथित फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर संपत्ति के दो विक्रय दस्तावेज निष्पादित किए गए तथा गट नंबरों में भी कथित रूप से छेड़छाड़ की गई।

सुनवाई के दौरान जांच अधिकारी ने न्यायालय को बताया कि आरोपी को कई नोटिस जारी किए गए, लेकिन उसने मूल पावर ऑफ अटॉर्नी प्रस्तुत नहीं की और जांच में अपेक्षित सहयोग भी नहीं किया। पुलिस ने यह भी बताया कि पावर ऑफ अटॉर्नी के साथ संलग्न आधार कार्ड की तस्वीर और वास्तविक आधार रिकॉर्ड में उपलब्ध तस्वीर में प्रथम दृष्टया अंतर दिखाई देता है। मामले में आधार कार्ड सहित कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों की बरामदगी अभी बाकी है।

पुलिस ने यह भी दावा किया कि जांच के दौरान प्रीतमकुमार सुखलाल पाटले ने अपने बयान में स्वीकार किया कि वह कथित रूप से आवेदक के कहने पर तन्नूमल अरतमल कारडा के स्थान पर रायपुर स्थित उप-पंजीयक कार्यालय में उपस्थित हुआ था। पुलिस के अनुसार पूरे कथित षड्यंत्र का पर्दाफाश करने, अन्य आरोपियों की भूमिका स्पष्ट करने तथा दस्तावेज एवं इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य बरामद करने के लिए आरोपी की हिरासत में पूछताछ आवश्यक है।

राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक एड. महेश चंदवानी ने न्यायालय में पक्ष रखा। वहीं बचाव पक्ष की ओर से एड. गिरीश बापट और एड. सचिन बोरकर ने पक्ष रखा।

न्यायालय ने माना— हिरासत में पूछताछ जरूरी

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड प्रथम दृष्टया गंभीर आरोपों की ओर संकेत करता है। मूल दस्तावेजों की बरामदगी, कथित षड्यंत्र का खुलासा और प्रत्येक आरोपी की भूमिका स्पष्ट करने के लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक प्रतीत होती है। न्यायालय ने यह भी माना कि इस स्तर पर अग्रिम जमानत दिए जाने से जांच प्रभावित हो सकती है। इन्हीं आधारों पर अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई।

हालांकि, आरोपी को उच्च न्यायालय में अपील का अवसर देने के लिए अंतरिम अग्रिम जमानत सात दिनों तक बढ़ा दी गई है।

मामले में ये हैं नामजद आरोपी

एफआईआर में निम्नलिखित आरोपियों के नाम दर्ज हैं—

  • लक्ष्मीकांत दौलत बारेवार
  • मुकेशकुमार तन्नूमल कारडा
  • कुवरलाल चिंदू भोयर
  • अतीक रफीक अहमद
  • मनीष मोहनराव बोसकुटे

अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी पर उठे सवाल

न्यायालयीन अभिलेखों के अनुसार अब तक केवल मुकेशकुमार तन्नूमल कारडा ने अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किया था, जिसे खारिज कर दिया गया। आदेश में अन्य नामजद आरोपियों द्वारा किसी अग्रिम जमानत आवेदन का उल्लेख नहीं है।

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब एफआईआर में सभी आरोपी नामजद हैं और न्यायालय ने स्वयं मामले की गंभीरता, दस्तावेजों की बरामदगी तथा हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता का उल्लेख किया है, तो अन्य आरोपियों के विरुद्ध अब तक गिरफ्तारी अथवा अन्य आवश्यक कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हुई। अब सभी की नजर पुलिस की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई है।

शिकायतकर्ता पक्ष ने की निष्पक्ष कार्रवाई की मांग

शिकायतकर्ता गंगाराम तन्नूमल कारडा की ओर से अधिवक्ता एड. नितेश पोपट एवं एड. प्रकाश टोलानी ने अग्रिम जमानत का विरोध किया।

न्यायालय के आदेश के बाद गंगाराम तन्नूमल कारडा ने कहा कि अग्रिम जमानत याचिका खारिज होना जांच के लिए महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने मांग की कि मामले में नामजद सभी आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय के आदेश और जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई की जाए, ताकि निष्पक्ष, प्रभावी और पारदर्शी जांच सुनिश्चित हो सके।

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